अनंत सिंह की सदस्यता: दो निर्दलीय MLC की सदस्यता पर सवाल, अनंत सिंह पर कार्रवाई से बढ़ेगा सियासी विवाद।
पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों NDA के सामने एक ऐसा सियासी संकट खड़ा हो गया है, जिसमें किसी भी फैसले का राजनीतिक असर पड़ना तय माना जा रहा है। मामला भाजपा में शामिल हुए दो निर्दलीय विधान परिषद सदस्यों (MLC) और मोकामा के विधायक अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता से जुड़ा है। सवाल यह है कि अगर दो MLC की सदस्यता बचती है और अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त होती है, तो NDA इस फैसले का राजनीतिक जवाब कैसे देगी?
दरअसल, बिहार के दो निर्दलीय MLC ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। इस घटनाक्रम के बाद उनकी सदस्यता को लेकर कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं। दलबदल से जुड़े नियमों के तहत उनकी सदस्यता पर अयोग्यता की कार्रवाई की मांग उठ सकती है। हालांकि, इस मामले में अंतिम निर्णय विधान परिषद के सभापति को लेना है।
90 दिनों में फैसला देने की सुप्रीम कोर्ट की नसीहत
सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल से जुड़े मामलों में निर्णय लेने के लिए उचित समयसीमा तय करने की जरूरत पर जोर दिया है। कई मामलों में 90 दिनों के भीतर फैसला करने की बात कही गई है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से ऐसे मामलों के निपटारे में देरी भी देखने को मिलती रही है। यही वजह है कि दोनों MLC की सदस्यता को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।
अनंत सिंह की सदस्यता का मामला भी बना चुनौती
दूसरी तरफ, मोकामा के विधायक अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त करने को लेकर जदयू ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा है। ऐसे में NDA के सामने मुश्किल स्थिति बनती दिखाई दे रही है। यदि भाजपा में शामिल हुए दोनों MLC को राहत मिलती है और अनंत सिंह के खिलाफ सदस्यता समाप्त करने की कार्रवाई होती है, तो विपक्ष और राजनीतिक विरोधियों को सवाल उठाने का मौका मिल सकता है।
इस पूरे विवाद में सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। तीनों नेताओं का संबंध भूमिहार समाज से है, जिसे बिहार की राजनीति में प्रभावशाली वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है।
भूमिहार समाज की बैठक में भी उठेगा सवाल
पटना में हर सप्ताह भूमिहार समाज की बैठक आयोजित करने वाले अंकित चन्द्रायण ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अनंत सिंह के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है? उन्होंने राजू सिंह और राहुल सिंह से जुड़े मामलों का उदाहरण देते हुए NDA की कार्रवाई के तरीके पर सवाल खड़े किए हैं।
अंकित चन्द्रायण के मुताबिक, यदि एक मामले में कार्रवाई होती है तो दूसरे मामलों में भी समान नियम लागू होने चाहिए। रविवार शाम होने वाली बैठक में भी इस मुद्दे पर चर्चा होने की बात कही गई है।
नीतीश कुमार की सहमति का बयान बढ़ा सकता है मुश्किल
इस मामले को और संवेदनशील तब माना जा रहा है, जब जदयू के वरिष्ठ नेता संजय झा यह कह चुके हैं कि अनंत सिंह पर कार्रवाई नीतीश कुमार की सहमति से हुई है। ऐसे में अगर अनंत सिंह की सदस्यता समाप्त नहीं होती है, तो राजनीतिक तौर पर यह सवाल उठ सकता है कि मुख्यमंत्री की सहमति के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
फिलहाल NDA के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ भाजपा में शामिल हुए दोनों MLC की सदस्यता का सवाल है, तो दूसरी तरफ अनंत सिंह पर संभावित कार्रवाई का मामला। ऐसे में किसी एक पक्ष में लिया गया फैसला दूसरे पक्ष के लिए राजनीतिक सवाल खड़े कर सकता है।
कुल मिलाकर, NDA के लिए स्थिति आगे कुआं और पीछे खाई जैसी बनती दिख रही है। अब सबकी नजर विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति के फैसले पर टिकी है।