दिल्ली प्रदर्शन के दौरान भड़काऊ पोस्ट का मामला: पुलिस ने पाकिस्तानी IP एड्रेस से जुड़े हैंडल की जांच शुरू की

दिल्ली प्रदर्शन भड़काऊ पोस्ट नई दिल्ली: दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित भ्रामक और भड़काऊ पोस्ट को लेकर पुलिस ने जांच तेज कर दी है। दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त संजय भाटिया ने बताया कि सोशल मीडिया पर साझा की गई कई पोस्ट की निगरानी की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इन पोस्ट के जरिए कहीं गलत जानकारी फैलाकर माहौल बिगाड़ने या लोगों को भड़काने की कोशिश तो नहीं की गई। संजय भाटिया के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की IFSO यूनिट में साइबर पेट्रोलिंग के लिए एक विशेष टीम तैनात है। यह टीम सोशल मीडिया पर प्रकाशित पोस्ट की निगरानी करती है और उनकी प्रामाणिकता के साथ-साथ कानूनी पहलुओं की भी जांच करती है। यदि किसी पोस्ट में तथ्यात्मक रूप से गलत जानकारी, अफवाह, धमकी, मानहानिकारक सामग्री या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली बातें पाई जाती हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाती है। पाकिस्तानी IP एड्रेस से जुड़े हैंडल की जांच अतिरिक्त पुलिस आयुक्त संजय भाटिया ने बताया कि एक विशेष सोशल मीडिया हैंडल के रजिस्ट्रेशन से संबंधित जानकारी मांगे जाने पर उसका IP एड्रेस पाकिस्तान से जुड़ा हुआ पाया गया। पुलिस फिलहाल इस मामले की जांच कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच की प्रक्रिया जारी है और आगे मिलने वाले तथ्यों तथा साक्ष्यों के आधार पर अधिक जानकारी साझा की जाएगी। हालांकि, किसी हैंडल का IP एड्रेस पाकिस्तान से जुड़ा मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पोस्ट किस व्यक्ति ने प्रकाशित की या उसके पीछे किसकी भूमिका थी। इस पहलू की पुष्टि के लिए पुलिस को अन्य डिजिटल साक्ष्यों और तकनीकी जानकारियों की भी जांच करनी होगी। पुलिस फायरिंग के दावे वाली पोस्ट पर कार्रवाई संजय भाटिया ने एक अन्य पोस्ट का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें कथित तौर पर यह दावा किया गया था कि प्रदर्शनकारियों पर पुलिस गोली चला रही है। पुलिस के अनुसार, यह दावा सही नहीं था और इससे तनावपूर्ण माहौल पैदा होने की आशंका थी। उन्होंने कहा कि इस पोस्ट को लेकर संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से उसे हटाने का अनुरोध किया गया और मामला भी दर्ज किया गया। पुलिस अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि प्रदर्शनों के दौरान गलत सूचनाएं फैलने से स्थिति प्रभावित हो सकती है, इसलिए ऐसे मामलों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। सोशल मीडिया पोस्ट की निगरानी कर रही साइबर टीम दिल्ली पुलिस के अनुसार, हालिया प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर प्रकाशित कई पोस्ट जांच के दायरे में हैं। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि किन पोस्ट में गलत जानकारी साझा की गई और किन मामलों में कानून का उल्लंघन हुआ है। अधिकारियों ने बताया कि इस संबंध में अन्य मामले भी दर्ज किए गए हैं और उनकी जांच जारी है। डिजिटल माध्यमों पर किसी भी संवेदनशील घटना की जानकारी साझा करते समय उसकी पुष्टि करना जरूरी है। अपुष्ट दावों को सच मानकर आगे बढ़ाने से भ्रम फैल सकता है और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। फिलहाल, दिल्ली पुलिस की जांच जारी है। पाकिस्तानी IP एड्रेस से जुड़े बताए गए हैंडल और पुलिस फायरिंग के दावे वाली पोस्ट के मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।

दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लेने का आरोप, कवरेज में बाधा से उठे सवाल

नई दिल्ली: दिल्ली में आज हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर पत्रकारों की स्वतंत्रता और मीडिया कवरेज पर सवाल उठ रहे हैं। प्रदर्शन स्थल पर प्रदर्शनकारियों के साथ बड़ी संख्या में पत्रकारों को भी हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि वैध पहचान पत्र रखने वाले कुछ पत्रकारों को बैरिकेडिंग पर रोक दिया गया, जबकि विरोध जताने पर कुछ को हिरासत में ले लिया गया। पत्रकारों को कवरेज करने से रोकने का आरोप प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों की मौजूदगी का उद्देश्य घटनास्थल की स्थिति को कैमरे और रिपोर्टिंग के माध्यम से जनता तक पहुंचाना था। हालांकि, सामने आए विवरणों के अनुसार, कई पत्रकारों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने और घटनाक्रम की कवरेज करने में परेशानी का सामना करना पड़ा। सबसे अहम सवाल यह है कि जब पत्रकारों के पास वैध पहचान पत्र मौजूद थे, तो उन्हें कवरेज करने से क्यों रोका गया? यदि किसी पत्रकार को कानून-व्यवस्था से जुड़ी किसी विशेष वजह से रोका गया, तो उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट किया जाना भी जरूरी है। बैरिकेडिंग पर रोके गए पत्रकार, हिरासत पर भी सवाल जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन स्थल के आसपास बैरिकेडिंग की थी। इस दौरान कुछ पत्रकारों को आगे जाने की अनुमति नहीं मिली। आरोप यह भी है कि रोकने की कार्रवाई का विरोध करने वाले कुछ पत्रकारों को हिरासत में ले लिया गया। इस घटनाक्रम ने मीडिया के कामकाज और विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग को लेकर बहस तेज कर दी है। पत्रकारों का काम घटनास्थल पर मौजूद रहकर तथ्यों की जानकारी जुटाना और जनता तक सही तस्वीर पहुंचाना होता है। ऐसे में रिपोर्टिंग के दौरान आने वाली बाधाएं सूचना के प्रवाह को प्रभावित कर सकती हैं। मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर उठे सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है। पत्रकारों को सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े उचित नियमों का पालन करते हुए अपना काम करने का अवसर मिलना चाहिए। वहीं, पुलिस की जिम्मेदारी भीड़ को नियंत्रित करने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की होती है। ऐसे मामलों में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि पुलिस की कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई और क्या पत्रकारों को हिरासत में लेने के पीछे कोई विशेष कारण था। फिलहाल, इस घटनाक्रम में हिरासत में लिए गए पत्रकारों की संख्या, उनकी पहचान और पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया से जुड़ी विस्तृत जानकारी की पुष्टि होना बाकी है। इन तथ्यों के सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी। मुख्य बिंदु: दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को रोकने और हिरासत में लेने के आरोपों ने मीडिया की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और घटनास्थल पर रिपोर्टिंग के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं।

दिल्ली में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट बनाने वाले गिरोह का भंडाफोड़, 9 आरोपी गिरफ्तार

AI और फोटोशॉप की मदद से मेडिकल रिपोर्ट में करते थे हेरफेर, दिव्यांगता प्रमाणपत्र जनरेशन पोर्टल पर अपलोड कर तैयार करते थे फर्जी दस्तावेज नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र तैयार करने वाले एक गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस मामले में दिल्ली और उत्तर प्रदेश से कुल 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के मुताबिक, गिरोह के सदस्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और फोटोशॉप जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर मेडिकल रिपोर्ट में बदलाव करते थे। इसके बाद इन दस्तावेजों को दिव्यांगता प्रमाणपत्र जनरेशन पोर्टल पर अपलोड करके कथित तौर पर फर्जी प्रमाणपत्र तैयार किए जाते थे। उत्तरी जिले की डीसीपी निहारिका भट्ट ने इस मामले की जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस ने दिल्ली और यूपी में कार्रवाई कर गिरोह के नौ सदस्यों को गिरफ्तार किया है। जांच के दौरान कई ऐसे प्रमाणपत्र सामने आए हैं, जिनकी सत्यता की पड़ताल की जा रही है। पुलिस को आशंका है कि इस मामले में आगे भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं। AI और फोटोशॉप से मेडिकल रिपोर्ट में करते थे बदलाव पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य तकनीक का दुरुपयोग कर मेडिकल दस्तावेजों में कथित तौर पर हेरफेर करते थे। इसके लिए नाम और जन्मतिथि जैसी जानकारियों को बदला जाता था। इसके बाद संशोधित मेडिकल रिपोर्ट को दिव्यांगता प्रमाणपत्र जनरेशन पोर्टल पर अपलोड किया जाता था, ताकि फर्जी प्रमाणपत्र तैयार किए जा सकें। इस पूरे मामले में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल की बात सामने आने के बाद जांच एजेंसियां दस्तावेजों की प्रामाणिकता और उनकी तैयारी की प्रक्रिया की जांच कर रही हैं। कई प्रमाणपत्र जांच के दायरे में डीसीपी निहारिका भट्ट के मुताबिक, पुलिस को कई संदिग्ध प्रमाणपत्र मिले हैं। इन सभी दस्तावेजों की जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कितने प्रमाणपत्र फर्जी तरीके से तैयार किए गए और इस नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा है। जांच के दौरान गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस कथित फर्जीवाड़े में कौन-कौन शामिल था और दस्तावेजों को तैयार करने के लिए किन तकनीकी माध्यमों का इस्तेमाल किया गया। आगे भी हो सकती हैं गिरफ्तारियां फिलहाल पुलिस मामले की विस्तृत जांच में जुटी है। बरामद प्रमाणपत्रों की सत्यता की पुष्टि और पूरे नेटवर्क की भूमिका स्पष्ट होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। पुलिस के बयान के अनुसार, जांच का दायरा बढ़ने के साथ इस मामले में और गिरफ्तारियां होने की संभावना है। यह मामला दिखाता है कि AI और डिजिटल एडिटिंग जैसे आधुनिक उपकरणों का गलत इस्तेमाल करके आधिकारिक दस्तावेजों में हेरफेर करने की कोशिश की जा सकती है। ऐसे मामलों में दस्तावेजों का सत्यापन और डिजिटल साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

दिल्ली AI वीडियो विवाद पर प्रदीप भंडारी का राहुल गांधी पर निशाना, उठाए कई सवाल

नई दिल्ली: दिल्ली में महिला पत्रकार से कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर चल रहे विवाद के बीच भाजपा नेता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस वीडियो के आधार पर दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी पर सवाल उठाए गए, वह वास्तविक वीडियो नहीं बल्कि AI की मदद से तैयार किया गया था। प्रदीप भंडारी ने कहा कि राहुल गांधी की ओर से सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर पोस्ट किए जाने के बाद कांग्रेस से जुड़े लोगों ने भी वीडियो को व्यापक स्तर पर साझा किया। उनके मुताबिक, बाद में दिल्ली पुलिस की जांच में वीडियो के कथित तौर पर फर्जी और AI-generated होने की बात सामने आई। AI से बनाए गए वीडियो का दावा दिल्ली पुलिस ने 6 अक्टूबर को बताया कि उसने 24 वर्षीय नदीम अहमद को कथित रूप से एक हेरफेर किए गए वीडियो को बनाने और प्रसारित करने के मामले में गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, वीडियो में ACP विवेक भगत को महिला के साथ अनुचित व्यवहार करते हुए दिखाया गया था और इसे वास्तविक CCTV फुटेज जैसा प्रस्तुत किया गया। पुलिस का कहना है कि तकनीकी जांच में वीडियो के AI-generated होने की पुष्टि हुई। प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस से मांगा स्पष्टीकरण भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का पूरा इको-सिस्टम इस वीडियो को लेकर एक नैरेटिव बनाने में सक्रिय रहा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वीडियो फर्जी साबित हुआ है तो राहुल गांधी और कांग्रेस की ओर से इस पर स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने इसे कांग्रेस की राजनीति के एक कथित पैटर्न से जोड़ते हुए कहा कि फर्जी सूचनाओं के जरिए लोकतांत्रिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, यह प्रदीप भंडारी का राजनीतिक आरोप है, जिसे स्वतंत्र तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता। महिला पत्रकारों के आरोपों की अलग जांच इस पूरे विवाद में यह भी महत्वपूर्ण है कि महिला पत्रकारों ने 3 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर कथित दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इन शिकायतों को आगे की जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। यानी AI वीडियो के फर्जी होने की पुलिस जांच और महिला पत्रकारों की वास्तविक शिकायतों की जांच अलग-अलग मामले हैं। प्रदीप भंडारी ने इसी संदर्भ में राहुल गांधी और कांग्रेस से सवाल किया कि कथित फर्जी वीडियो के सामने आने के बाद क्या वे इस मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे।

दिल्ली में ड्रग्स तस्करी नेटवर्क का खुलासा, 57 लाख कैश और सोने-चांदी के गहने बरामद

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने नरेला इलाके में ड्रग्स तस्करी से जुड़े एक नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए बड़ी बरामदगी की है। पुलिस के मुताबिक, जांच के दौरान एक महिला समेत आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और राजस्थान के प्रतापगढ़ में की गई छापेमारी के दौरान भी एक संदिग्ध सहयोगी को पकड़ा गया। आउटर नॉर्थ के DCP शोभित सक्सेना ने बताया कि नरेला में पिछले सप्ताह ड्रग्स तस्करी के मामले में पार्वती और शानू नाम की महिला को पकड़ा गया था। पुलिस की जांच में सामने आया कि वह राजस्थान के प्रतापगढ़ से मादक पदार्थ लेकर दिल्ली आती थी। जांच को आगे बढ़ाते हुए पुलिस टीम ने प्रतापगढ़ में भी छापेमारी की। इस कार्रवाई के दौरान महिला के कथित करीबी सहयोगी साहिब खान को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, तलाशी के दौरान करीब 265 ग्राम स्मैक बरामद की गई। पुलिस ने इसके बाद एक अन्य स्थान पर भी कार्रवाई की। DCP के मुताबिक, आरोपी के घर से बड़ी मात्रा में नकदी और कीमती आभूषण मिले। तलाशी के दौरान करीब 57 लाख रुपये नकद, 350 ग्राम सोने के आभूषण और 150 ग्राम चांदी के आभूषण बरामद किए जाने की बात कही गई है। इसके अलावा पुलिस को चार संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं। अधिकारियों का कहना है कि बरामद संपत्ति और दस्तावेजों की जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इनका संबंध कथित ड्रग्स तस्करी से है या नहीं। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, पूरे नेटवर्क की कड़ियों को खंगाला जा रहा है और मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है। पुलिस बरामद नकदी, आभूषण और संपत्ति के दस्तावेजों के स्रोत की भी जांच कर रही है। नोट: पुलिस द्वारा लगाए गए आरोप और बरामदगी की जानकारी जांच का हिस्सा है। मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

कश्मीरी गेट मर्डर केस का खुलासा, रिश्तेदार ही निकला मुख्य आरोपी

नई दिल्ली: कश्मीरी गेट इलाके में हुई हत्या और लूट की वारदात की गुत्थी पुलिस ने सुलझाने का दावा किया है। नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट की DCP निहारिका भट्ट के मुताबिक, मामले में मृतक प्रभात का रिश्तेदार ओम मुख्य आरोपी के तौर पर सामने आया है। पुलिस के अनुसार, ओम को प्रभात के रोजाना के आने-जाने और पैसों से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी थी। DCP निहारिका भट्ट ने बताया कि ओम को पता था कि प्रभात हर शाम गांधीनगर से काफी मात्रा में नकदी लेकर चांदनी चौक की ओर जाता था। इसी जानकारी को आधार बनाकर कथित तौर पर लूट की साजिश रची गई। पुलिस के मुताबिक, ओम ने इस वारदात को अंजाम देने के लिए अपने कुछ साथियों को झांसी और कानपुर से दिल्ली बुलाया था। पुलिस अधिकारी के अनुसार, इस पूरी साजिश में कुल सात युवक शामिल थे। आरोप है कि 26 तारीख की शाम इन लोगों ने ऑटो रिक्शा को रास्ते में रोककर लूट की कोशिश की। इसी दौरान स्थिति बिगड़ गई और प्रभात की हत्या कर दी गई। पुलिस की शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि आरोपियों को प्रभात के पास मौजूद रकम और उसके नियमित रूट की जानकारी थी। इसी वजह से वारदात को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम देने की आशंका जताई जा रही है। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों की भूमिका और घटनाक्रम से जुड़े अन्य पहलुओं को भी खंगाला। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि करीबी लोगों को किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों और आर्थिक लेनदेन की जानकारी किस तरह अपराध की वजह बन सकती है। हालांकि, पुलिस की जांच अभी जारी है और मामले से जुड़े सभी तथ्यों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि वारदात की पूरी योजना कब और कैसे बनाई गई थी, सभी आरोपी एक-दूसरे के संपर्क में कैसे आए और घटना के बाद उन्होंने क्या किया। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।