दिल्ली में प्रतिबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, वकील संजय हेगड़े ने उठाए अहम सवाल

सुप्रीम कोर्ट सुनवाई:नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में आज हुई सुनवाई को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि अदालत ने उन प्रतिबंधात्मक कदमों पर ध्यान दिया है, जिन्हें वह जरूरत से ज्यादा व्यापक मान रही है। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने प्रशासन को यह समझाने की जरूरत पर जोर दिया है कि किसी क्षेत्र में लागू पाबंदियां कितनी आवश्यक हैं और उनका दायरा किस आधार पर तय किया गया है। संजय हेगड़े के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति और सीमा परिस्थितियों के अनुपात में होनी चाहिए। किसी भी कार्रवाई में आवश्यकता से अधिक सख्ती नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने मामले का व्यापक पक्ष रखने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने उनसे नक्शे पर उन स्थानों की पहचान करने को कहा, जहां संबंधित प्रतिबंध लागू हैं। BNS की धारा 163 के इस्तेमाल पर मांगा जवाब भारतीय नागरिक सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिबंधों के संदर्भ में लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 का जिक्र करते हुए संजय हेगड़े ने कहा कि अदालत ने संबंधित अधिकारियों से उनकी कार्रवाई का आधार स्पष्ट करने को कहा है। उनके अनुसार, कोर्ट ने यह समझने की कोशिश की कि जिस इलाके में धारा 163 लागू की गई है, वहां प्रतिबंधों और हिरासत जैसी कार्रवाइयों की आवश्यकता क्या है। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी सीमित क्षेत्र में लागू प्रतिबंधों को आधार बनाकर दूसरे इलाके में किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की कार्रवाई को स्वतः सही नहीं ठहराया जा सकता। हेगड़े ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी क्षेत्र में प्रतिबंध लागू हैं, तो उनके आधार पर गुरुग्राम या उस निर्धारित क्षेत्र से बाहर किसी अन्य स्थान पर की गई कार्रवाई के लिए अलग से कानूनी औचित्य जरूरी होगा। उनके मुताबिक, अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और आगे इस मामले की जांच करेगी। कानून और संविधान की रक्षा में वकीलों की भूमिका संजय हेगड़े ने वकीलों की जिम्मेदारी पर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि वकीलों का काम केवल अदालत में बहस करना नहीं है। हिरासत के मामलों में पुलिस थानों में भी उनकी भूमिका अहम होती है, जहां वे यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि कार्रवाई कानून और संविधान के अनुरूप हो। उनकी टिप्पणी न्यायिक निगरानी, प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े सवालों को सामने लाती है। हालांकि, मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के आदेश और संबंधित अधिकारियों के जवाबों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, नाबालिगों के कॉन्ट्रैक्ट पर उठी चर्चा

नई दिल्ली | 28 सितंबर 2026 सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के अकाउंट को लेकर अहम सवाल उठाया है। अदालत ने पूछा कि जब भारतीय कानून के तहत नाबालिग कॉन्ट्रैक्ट करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम नहीं हैं, तो फिर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके अकाउंट किस आधार पर सक्रिय किए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा? सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाते समय यूजर को कंपनी की शर्तों और नियमों को स्वीकार करना होता है। अदालत ने इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए नाबालिगों और प्लेटफॉर्म के बीच बनने वाले ऐसे कॉन्ट्रैक्ट की कानूनी स्थिति पर ध्यान आकर्षित किया। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा भी अहम मुद्दा सोशल मीडिया पर बच्चों की बढ़ती मौजूदगी के बीच उम्र सत्यापन, डेटा सुरक्षा, अभिभावकों की सहमति और ऑनलाइन सुरक्षा जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। ऐसे में यह सवाल केवल अकाउंट बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी से भी जुड़ता है। आगे क्या हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट की ओर से उठाया गया सवाल इस मामले में आगे होने वाली सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, अदालत की टिप्पणी या सवाल को अंतिम फैसला नहीं माना जाता। आगे की कार्यवाही में इस विषय पर कानूनी स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। 📌 निष्कर्ष:बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल डिजिटल प्लेटफॉर्म, नाबालिगों के अधिकार और ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े व्यापक कानूनी मुद्दे की ओर ध्यान खींचता है।