ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र के कई देश भी इस तनाव के कारण आर्थिक और रणनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। इसी मुद्दे पर नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में नेशनल सिक्योरिटी अफेयर्स के विशिष्ट प्रोफेसर गवदत बहगत ने अपनी राय रखी है।
गवदत बहगत के मुताबिक, मौजूदा हालात में MEC एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे केवल एक विकल्प के तौर पर देखने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि क्षेत्रीय संकट का समाधान किसी एक रास्ते पर निर्भर नहीं होना चाहिए, बल्कि अलग-अलग संभावनाओं और कूटनीतिक प्रयासों को साथ लेकर आगे बढ़ना जरूरी है।
उन्होंने विशेष रूप से सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों की स्थिति की ओर ध्यान दिलाया। बहगत के अनुसार, ईरान युद्ध की कीमत इन देशों को भी चुकानी पड़ रही है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है। ऐसे में युद्ध का दायरा बढ़ना पूरे खाड़ी क्षेत्र के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।
बहगत ने उम्मीद जताई कि अंततः कूटनीति को प्राथमिकता मिलेगी और बातचीत के जरिए तनाव कम करने का रास्ता निकलेगा। उनके बयान में इस बात पर जोर दिखाई देता है कि सैन्य टकराव के बजाय संवाद और राजनीतिक समाधान क्षेत्र में स्थिरता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
मध्य पूर्व में लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच खाड़ी देशों के लिए क्षेत्रीय स्थिरता बेहद अहम है। ईरान से जुड़े किसी भी बड़े सैन्य टकराव का प्रभाव पड़ोसी देशों की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक पहल और बातचीत की कोशिशों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
गवदत बहगत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान युद्ध को लेकर क्षेत्रीय परिस्थितियां लगातार चर्चा में हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में कूटनीति प्रभावी होगी और तनाव को कम करने के लिए बातचीत का रास्ता आगे बढ़ेगा।