नई दिल्ली: ब्रिक्स देशों के बीच लंबे समय से चल रही कूटनीतिक बातचीत के बाद संयुक्त बयान पर सहमति बनना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, सदस्य देशों के बीच कई संवेदनशील और विवादित मुद्दों पर चर्चा हुई और बातचीत का दौर देर रात से लेकर सुबह करीब चार बजे तक जारी रहा। अलग-अलग मुद्दों पर देशों के रुख में अंतर होने के बावजूद आखिरकार संयुक्त बयान के मसौदे पर सहमति बनाने में सफलता मिली।
इस पूरी प्रक्रिया में भारत ने सदस्य देशों के बीच संवाद बनाए रखने और अलग-अलग विचारों के बीच साझा सहमति तलाशने पर जोर दिया। ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद संगठन के भीतर अब पहले की तुलना में कहीं अधिक विविध राजनीतिक और रणनीतिक हित मौजूद हैं। ऐसे में सभी देशों को एक साझा मंच पर लाना आसान नहीं है।
इस चुनौती को पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों ने और जटिल बना दिया है। ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ब्रिक्स के सदस्य हैं, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति और कई रणनीतिक मुद्दों पर इन देशों के बीच मतभेद रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच इन देशों के बीच किसी साझा बयान पर सहमति बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत ने बातचीत के दौरान मतभेदों को ब्रिक्स की सामूहिक प्रक्रिया पर हावी नहीं होने देने की कोशिश की। लगातार संवाद और सहमति निर्माण के प्रयासों के जरिए एक ऐसा रास्ता तैयार किया गया, जिस पर विभिन्न सदस्य देश साथ आ सके।
संयुक्त बयान का जारी होना ब्रिक्स के भीतर आपसी संवाद और सहयोग के लिहाज से अहम माना जा रहा है। यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं वाले देशों के बीच बातचीत के जरिए साझा मुद्दों पर सहमति बनाई जा सकती है।
भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वैश्विक मंच पर उसकी संवाद कायम करने और विभिन्न पक्षों के बीच सहमति बनाने की कूटनीतिक क्षमता का संकेत मिलता है।