नई दिल्ली: चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक बार फिर चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के भरोसे से जुड़े सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए सिर्फ चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका स्वतंत्र दिखाई देना भी जरूरी है।
मामला 2023 में बनाए गए उस कानून से जुड़ा है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान किया गया है। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अंतरिम व्यवस्था में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे।
जस्टिस दत्ता ने चयन समिति की संरचना को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री से अपने ही नामितकर्ता के खिलाफ खड़े होने की अपेक्षा करना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में विपक्ष के नेता की भूमिका प्रभावी संतुलन बनाने के बजाय सीमित हो सकती है। हालांकि, ये टिप्पणियां प्रथमदृष्टया विचार हैं और मामले पर अंतिम संवैधानिक फैसला अभी बाकी है।
जस्टिस दत्ता ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता केवल नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की व्यक्तिगत ईमानदारी या योग्यता का विषय नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया आम लोगों को कितनी निष्पक्ष और स्वतंत्र नजर आती है। यही भरोसा चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता का अहम हिस्सा माना जाता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ की राय अलग-अलग रही। जस्टिस दत्ता ने जहां मौजूदा पीठ में ही मामले को तय करने की बात कही, वहीं जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इसे बड़ी संविधान पीठ के सामने भेजने के पक्ष में राय दी। इसके बाद मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया है, जो उचित संख्या वाली संविधान पीठ के गठन पर निर्णय करेंगे।
ऐसे में आगे की सुनवाई में यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि 2023 के कानून के तहत बनी नियुक्ति व्यवस्था संविधान में निहित चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के मानकों पर कितनी खरी उतरती है। फिलहाल अदालत की टिप्पणियां इस व्यापक बहस को सामने लाती हैं कि चुनावी संस्था की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी निष्पक्षता पर जनता का विश्वास भी मजबूत रहना चाहिए।