सहारनपुर, उत्तर प्रदेश। उमर खालिद से जुड़े मामले को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने न्याय व्यवस्था और मौलिक अधिकारों का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि अगर किसी मामले में देश की न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को इस पर संज्ञान लेना चाहिए।
इमरान मसूद के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति के साथ केवल धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने इसे संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को समानता और निष्पक्ष न्याय की उम्मीद रहती है। उनका कहना है कि न्यायपालिका से लोगों की सबसे बड़ी अपेक्षा निष्पक्ष न्याय की होती है और यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ न्याय नहीं हो रहा है, तो उच्चतम न्यायालय इस विषय पर विचार कर सकता है।
उमर खालिद से जुड़ा मामला दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के आरोपों से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उमर खालिद की जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए राहत देने से इनकार किया था। अदालत के फैसले में UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत के कानूनी मानदंडों पर विचार किया गया था।
इसके बाद जुलाई 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट में भी उमर खालिद की ओर से नियमित जमानत से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। अदालत ने मामले में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए और आगे की सुनवाई के लिए तारीख तय की थी।
इमरान मसूद का ताजा बयान इसी व्यापक कानूनी और राजनीतिक बहस के बीच सामने आया है। उन्होंने न्यायपालिका से हस्तक्षेप की उम्मीद जताते हुए कहा कि यदि किसी नागरिक के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तो संवैधानिक संस्थाओं को इस पर ध्यान देना चाहिए।
हालांकि, किसी व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव हुआ है या नहीं, यह एक तथ्यात्मक और कानूनी प्रश्न है, जिसका निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।