मोहन भागवत का बड़ा संदेश: भारतीय परंपराओं के अनुरूप जीवन जीना ही आगे बढ़ने का रास्ता

नागपुर, महाराष्ट्र: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अशोक सिंघल की जन्म शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की स्मृति केवल उसके नाम या तस्वीरों से जीवित नहीं रहती, बल्कि उसके विचारों और कार्यों को आगे बढ़ाने से बनी रहती है।

मोहन भागवत ने कहा कि महान व्यक्तियों के अच्छे कार्यों को अपने आचरण और प्रयासों के जरिए आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्होंने मराठी संघ गीत की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए बताया कि बोले गए शब्द समय के साथ खत्म हो जाते हैं, लेकिन अच्छे कार्य लंबे समय तक याद किए जाते हैं।

समाज की सामूहिक भागीदारी पर जोर

RSS प्रमुख ने कहा कि मोरोपंत और अशोक जी की स्मृतियों को जीवित रखने के लिए कई लोग अपने-अपने स्तर पर योगदान दे रहे हैं। कोई अपना समय दे रहा है तो कोई आर्थिक सहयोग कर रहा है। उन्होंने इसे समाज की सकारात्मक भागीदारी का उदाहरण बताया।

हालांकि, भागवत ने यह भी कहा कि पूरे समाज की आबादी की तुलना में ऐसे प्रयासों से जुड़ने वाले लोगों की संख्या अभी सीमित है। उनके मुताबिक, जब समाज का बड़ा वर्ग किसी सकारात्मक उद्देश्य के लिए एकजुट होकर काम करेगा, तभी उसका व्यापक प्रभाव दिखाई देगा।

धर्म और संस्कृति की रक्षा को बताया जरूरी

मोहन भागवत ने कहा कि भारत के सामने केवल अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि परिवार, धर्म और संस्कृति की रक्षा भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसे वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया के कल्याण के लिए भी भारत की भूमिका अहम हो सकती है।

उन्होंने कहा कि भारत के लोगों को अपनी जीवनशैली और आचरण में भारतीय परंपराओं और मूल्यों को अपनाना होगा। उनके अनुसार, केवल विचार व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन विचारों को व्यवहार में उतारने के लिए वास्तविक प्रयास यानी ‘पुरुषार्थ’ जरूरी है।

भागवत का संदेश मूल रूप से इस बात पर केंद्रित रहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव केवल किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी, भारतीय मूल्यों और निरंतर कर्म से संभव है।

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