बिहार विधान परिषद चुनाव: मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप, जनसुराज ने चुनाव आयोग से की शिकायत

पटना: बिहार में आगामी विधान परिषद चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी बीच मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया है। जनसुराज पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को चुनाव आयोग के कार्यालय पहुंचकर मतदाता सूची से जुड़ी शिकायत दर्ज कराई। जनसुराज पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया है कि विधान परिषद चुनाव के लिए तैयार की गई मतदाता सूची में कुछ स्तर पर अनियमितताएं हैं। पार्टी प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के अधिकारियों के समक्ष अपनी आपत्तियां रखीं और मामले की जांच कराने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में मतदाता सूची की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में सूची में किसी भी प्रकार की त्रुटि या विसंगति होने पर उसका असर चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर पड़ सकता है। पार्टी ने आयोग से शिकायतों की जांच कर आवश्यक सुधार करने का आग्रह किया है। जनसुराज पार्टी की ओर से यह भी कहा गया कि चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर सामने आने वाली आपत्तियों का समय रहते समाधान किया जाना जरूरी है, ताकि पात्र मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित होने की स्थिति न बने। विधान परिषद चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक दल लगातार अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। ऐसे में मतदाता सूची को लेकर जनसुराज की शिकायत ने चुनावी माहौल में एक नया मुद्दा जोड़ दिया है। अब निगाहें चुनाव आयोग की ओर हैं कि शिकायत में उठाए गए बिंदुओं पर क्या कार्रवाई की जाती है और मतदाता सूची में किसी तरह के संशोधन या सुधार की आवश्यकता पाई जाती है या नहीं। आयोग की जांच और आधिकारिक प्रतिक्रिया के बाद ही शिकायत से जुड़े तथ्यों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल जनसुराज पार्टी ने चुनाव आयोग के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज करा दी है। बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर आने वाले दिनों में यह मुद्दा और चर्चा में आने की संभावना है।

BRICS Business Forum में ईरानी राष्ट्रपति का बड़ा बयान, बोले- दुनिया कठिन दौर से गुजर रही

नई दिल्ली। BRICS Business Forum के लीडर्स सेशन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में दुनिया कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है और भू-राजनीतिक अस्थिरता ने देशों के लिए आर्थिक परिस्थितियों को और जटिल बना दिया है। मसूद पेजेशकियान के मुताबिक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ती राजनीतिक अनिश्चितता, सप्लाई चेन में आ रही बाधाएं और आर्थिक माध्यमों के जरिए राजनीतिक दबाव बनाने की प्रवृत्ति का असर वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है। ऐसे माहौल में देशों के लिए स्थिर और भरोसेमंद आर्थिक सहयोग पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। ईरानी राष्ट्रपति ने BRICS की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस समूह की ताकत केवल उसके सदस्य देशों की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित नहीं है। BRICS के सदस्य देशों के पास मौजूद आर्थिक क्षमताओं को अगर व्यापार, निवेश और संयुक्त वित्तीय सहयोग के प्रभावी नेटवर्क में बदला जाए, तो इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। उन्होंने कहा कि अब समय केवल संभावनाओं और चर्चाओं तक सीमित रहने का नहीं है। BRICS देशों को आपसी सहयोग को ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रमों में बदलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जिनका सीधा लाभ सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मिल सके। पेजेशकियान ने विशेष रूप से व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उनका मानना है कि मजबूत आर्थिक नेटवर्क तैयार होने से सदस्य देशों के बीच कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है और वैश्विक स्तर पर पैदा होने वाली आर्थिक चुनौतियों से निपटने में भी मदद मिल सकती है। BRICS Business Forum में दिया गया यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई स्तरों पर अनिश्चितताओं से जूझ रही है। ऐसे में BRICS के भीतर आर्थिक सहयोग को मजबूत करने और संभावित साझेदारियों को वास्तविक परियोजनाओं में बदलने पर जोर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत-रूस संबंधों को नई दिशा देने की तैयारी, राष्ट्रपति पुतिन ने पीएम मोदी को रूस आने का दिया न्योता

नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए रूस आने का निमंत्रण दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन के इस आमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, दोनों देशों के बीच होने वाला यह वार्षिक शिखर सम्मेलन भारत-रूस संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच होगा। सम्मेलन की तारीख अभी तय नहीं हुई है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, शिखर सम्मेलन की तिथियों को दोनों देशों के राजनयिक चैनलों के माध्यम से आपसी सुविधा और सहमति के आधार पर अंतिम रूप दिया जाएगा। भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, तकनीक और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में व्यापक संबंध रहे हैं। ऐसे में वार्षिक शिखर सम्मेलन को दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सीधी बातचीत के महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देखा जाता है। बैठक के दौरान द्विपक्षीय सहयोग से जुड़े मौजूदा मुद्दों के साथ-साथ भविष्य की साझेदारी को मजबूत करने के उपायों पर भी चर्चा होने की संभावना है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच नियमित उच्चस्तरीय संपर्क भारत-रूस संबंधों की निरंतरता को दर्शाता है। दोनों देश बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय हालात के बीच अपने पारंपरिक संबंधों को बनाए रखने और सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने पर जोर देते रहे हैं। फिलहाल 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन की तारीख को लेकर आधिकारिक घोषणा का इंतजार है। राजनयिक स्तर पर बातचीत पूरी होने के बाद कार्यक्रम की तारीख और अन्य विवरण सार्वजनिक किए जा सकते हैं।

नालंदा में स्व. देवलाल प्रसाद के श्रद्धांजलि समारोह में पहुंचे नीतीश कुमार, परिजनों से मिलकर जताई संवेदना

नालंदा: जिले के गौढ़ापुर में आयोजित स्वर्गीय देवलाल प्रसाद के श्रद्धांजलि समारोह में जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार शामिल हुए। उन्होंने स्वर्गीय देवलाल प्रसाद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने दिवंगत के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने परिवार के सदस्यों का हालचाल जाना और इस कठिन समय में उनके प्रति अपनी संवेदना प्रकट की। उन्होंने परिजनों को ढांढस बंधाते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। गौढ़ापुर में आयोजित इस कार्यक्रम में स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में लोग भी मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान स्वर्गीय देवलाल प्रसाद के सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े योगदान को याद किया गया। उपस्थित लोगों ने उनके निधन को परिवार और समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया। इस अवसर पर नालंदा के सांसद सहित जद (यू) के कई वरिष्ठ नेता और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। विधान परिषद में सत्तारूढ़ दल के उपनेता ललन सर्राफ, मुख्य सचेतक संजय कुमार सिंह उर्फ गांधी, पूर्व विधायक इंजीनियर सुनील कुमार समेत कई गणमान्य लोगों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दिवंगत के परिजनों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं। स्थानीय लोगों की मौजूदगी में श्रद्धांजलि सभा शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुई। नीतीश कुमार के गौढ़ापुर पहुंचने के दौरान स्थानीय लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत भी किया। इस मौके पर क्षेत्र के राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों पर भी लोगों के बीच चर्चा होती नजर आई। श्रद्धांजलि समारोह में शामिल होकर नीतीश कुमार ने परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की और दुख की इस घड़ी में उनके साथ खड़े रहने का संदेश दिया। कार्यक्रम में मौजूद नेताओं ने भी दिवंगत देवलाल प्रसाद की स्मृतियों को याद करते हुए उनके परिवार के प्रति अपनी सहानुभूति जताई।

जातिगत जनगणना को लेकर नाना पटोले का केंद्र सरकार पर निशाना, OBC हिस्सेदारी को लेकर उठाए सवाल

नई दिल्ली। जातिगत जनगणना और OBC समाज की हिस्सेदारी को लेकर कांग्रेस नेता नाना पटोले ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और राहुल गांधी की भूमिका इस मुद्दे पर स्पष्ट है। पार्टी का मानना है कि समाज के विभिन्न वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए सही संख्या, सही आंकड़े और जनसंख्या के अनुरूप हिस्सेदारी सुनिश्चित होना जरूरी है। नाना पटोले ने कहा कि सामाजिक न्याय की दिशा में जातिगत जनगणना एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके मुताबिक, आबादी के आंकड़े स्पष्ट होने के बाद ही अलग-अलग सामाजिक वर्गों को उनकी उचित भागीदारी और अधिकार दिलाने की दिशा में ठोस नीति बनाई जा सकती है। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि 21 सितंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने जातिगत जनगणना से जुड़े आंकड़ों को व्यवस्थित करने के लिए पहले से निर्धारित ड्रॉपडाउन सूची की आवश्यकता का उल्लेख किया था। पटोले का आरोप है कि अब केंद्र सरकार जातिगत जनगणना के मुद्दे से पीछे हटने की कोशिश कर रही है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में जातिगत गणना से संबंधित प्रक्रिया का भी जिक्र किया। पटोले ने दावा किया कि इसमें पूछे जा रहे सवालों को लेकर OBC समाज के हितों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से प्रश्नावली के 10वें सवाल का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाया। नाना पटोले ने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था से OBC वर्ग को उसके अधिकार और हिस्सेदारी से वंचित किए जाने का खतरा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस लगातार सामाजिक न्याय, समान अवसर और आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग करती रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से जातिगत जनगणना को लेकर स्पष्ट नीति सामने रखने की मांग करते हुए कहा कि देश के पिछड़े वर्गों को उनके वास्तविक आंकड़ों के आधार पर अधिकार और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। पटोले ने आशंका जताई कि यदि पारदर्शी तरीके से जातिगत आंकड़े सामने नहीं आए तो OBC समाज के हित प्रभावित हो सकते हैं।

मुंगेर के भीमबांध पहुंचे मुख्यमंत्री, आमजनों से संवाद कर जानी समस्याएं

मुंगेर: मुख्यमंत्री ने मुंगेर जिले के भीमबांध क्षेत्र का दौरा कर स्थानीय आमजनों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने लोगों से सीधे संवाद करते हुए क्षेत्र की मौजूदा स्थिति, उनकी समस्याओं और विकास से जुड़े सुझावों की जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने लोगों की बातों को गंभीरता से सुना और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए। भीमबांध पहुंचे मुख्यमंत्री के साथ स्थानीय लोगों ने क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और आवश्यकताओं को सामने रखा। लोगों ने बुनियादी सुविधाओं, विकास कार्यों और स्थानीय स्तर पर जरूरी व्यवस्थाओं को लेकर अपनी बात रखी। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि आम लोगों की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने क्षेत्र में चल रहे विभिन्न विकास कार्यों की भी समीक्षा की। उन्होंने संबंधित विभागों के अधिकारियों से योजनाओं की प्रगति की जानकारी ली और कार्यों को तय मानकों के अनुरूप पूरा करने पर जोर दिया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया कि विकास योजनाओं में गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जिन कार्यों में किसी तरह की समस्या या देरी सामने आ रही है, उसका तत्काल समाधान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आमजनों से प्राप्त सुझावों और शिकायतों पर भी आवश्यक कार्रवाई करने को कहा गया। स्थानीय लोगों से संवाद के दौरान मुख्यमंत्री ने क्षेत्र के विकास को लेकर सरकार की प्राथमिकताओं पर भी जोर दिया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचे और विकास कार्यों की नियमित निगरानी की जाए। मुख्यमंत्री के भीमबांध दौरे को स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आम लोगों से सीधे संवाद और विकास कार्यों की समीक्षा के माध्यम से प्रशासन को जमीनी समस्याओं की जानकारी मिलने के साथ उनके त्वरित समाधान की दिशा में भी पहल किए जाने की उम्मीद है।

पटना में SC-ST कल्याण पदाधिकारियों का विरोध, 7 सूत्रीय मांगों को लेकर काली पट्टी बांधकर जताया आक्रोश

पटना: बिहार में अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग से जुड़े प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर विरोध का रास्ता अपनाया है। शुक्रवार को पटना समेत राज्य के कई हिस्सों में पदाधिकारियों ने काली पट्टी बांधकर काम किया और अपनी मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया। प्रदर्शन कर रहे अधिकारियों का कहना है कि विभागीय स्तर पर काम करने के दौरान उन्हें कई तरह की बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि आवश्यक सुविधाओं और संसाधनों की कमी के कारण सरकारी योजनाओं को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करने में कठिनाई आती है। ऐसे में अधिकारियों ने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार के सामने सात सूत्रीय मांगें रखी हैं। संघ से जुड़े पदाधिकारियों के अनुसार, उनकी मांगों में कार्यस्थल पर जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने, कामकाज को सुचारु बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन देने और अधिकारियों से जुड़ी अन्य विभागीय समस्याओं का समाधान करने की मांग शामिल है। उनका कहना है कि वे लगातार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं, लेकिन कई स्तरों पर जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने से कार्य प्रभावित होता है। काली पट्टी बांधकर किया गया विरोध फिलहाल सांकेतिक बताया जा रहा है। पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी मांगों पर सरकार की ओर से जल्द सकारात्मक पहल नहीं होती है, तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है। संघ ने चेतावनी दी है कि मांगों पर विचार नहीं होने की स्थिति में पदाधिकारी सामूहिक अवकाश पर जाने का निर्णय ले सकते हैं। इससे विभागीय कार्यों और विभिन्न सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ने की संभावना है। अब देखना होगा कि सरकार और विभाग की ओर से इन मांगों को लेकर क्या कदम उठाया जाता है। फिलहाल पदाधिकारियों के विरोध ने विभागीय स्तर पर उनकी समस्याओं और कार्य परिस्थितियों को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

लखनऊ के ईको गार्डन में पंचायत सहायक कर्मचारियों का आंदोलन पांचवें दिन भी जारी, मांगों को लेकर बढ़ा आक्रोश

लखनऊ का ईको गार्डन इन दिनों पंचायत सहायक कर्मचारियों के आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अपनी विभिन्न मांगों को लेकर बड़ी संख्या में पंचायत सहायक कर्मचारी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन का आज पांचवां दिन है और प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लगातार आवाज उठाने के बावजूद उनकी समस्याओं का अब तक स्थायी समाधान नहीं हो पाया है। पंचायत सहायक कर्मचारी यूनियन के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से कर्मचारी शामिल हो रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांगों को सरकार और संबंधित विभाग के सामने रखते आए हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित समाधान नहीं मिला। इसी वजह से कर्मचारियों ने राजधानी लखनऊ में एकजुट होकर आंदोलन का रास्ता अपनाया है। ईको गार्डन में जुटे कर्मचारियों के बीच सरकार के प्रति नाराजगी भी देखने को मिल रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे किसी टकराव की स्थिति नहीं चाहते, बल्कि अपनी मांगों पर ठोस निर्णय और स्पष्ट कार्रवाई चाहते हैं। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से अब उनकी समस्याएं दूर नहीं होंगी। आंदोलन के पांचवें दिन प्रदर्शनकारियों की संख्या और सक्रियता ने सरकार के सामने चुनौती बढ़ा दी है। कर्मचारी संगठनों की ओर से अपनी मांगों को लेकर लगातार आवाज बुलंद की जा रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को आगे और व्यापक किया जा सकता है। आंदोलन स्थल पर कर्मचारियों के बीच भविष्य को लेकर चिंता और असंतोष दोनों नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि पंचायत स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण है, ऐसे में उनकी समस्याओं और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। फिलहाल सभी की निगाहें सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। पांचवें दिन भी जारी प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पंचायत सहायक कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत होती है या आंदोलन और तेज होता है, यह देखने वाली बात होगी।

बिहार में शरद यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह और रामविलास पासवान की आदमकद प्रतिमा लगाने की मांग

बिहार के तीन प्रमुख राजनीतिक चेहरों और पूर्व केंद्रीय मंत्रियों स्वर्गीय शरद यादव, स्वर्गीय डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह और स्वर्गीय रामविलास पासवान की स्मृति को स्थायी रूप से संरक्षित करने की मांग उठाई गई है। इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राज्य में तीनों नेताओं की आदमकद प्रतिमा स्थापित करने तथा उनकी जयंती या पुण्यतिथि को राजकीय समारोह के रूप में मनाने की मांग की गई है। पत्र के माध्यम से कहा गया है कि इन नेताओं ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन के दौरान बिहार और देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद तीनों नेताओं की पहचान जनसरोकारों से जुड़े राजनेताओं के रूप में रही। उनके समर्थकों और अनुयायियों के बीच आज भी उनके राजनीतिक योगदान को लेकर सम्मान का भाव है। मांग में कहा गया है कि राज्य में इन तीनों नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं स्थापित होने से आने वाली पीढ़ियों को उनके राजनीतिक और सामाजिक योगदान के बारे में जानकारी मिल सकेगी। साथ ही, उनके जन्मदिन अथवा पुण्यतिथि पर राजकीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाने से उनके योगदान को व्यापक रूप से याद किया जा सकेगा। शरद यादव लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे और बिहार की राजनीति में भी उनका महत्वपूर्ण प्रभाव रहा। वहीं डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह को ग्रामीण विकास और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका के लिए जाना जाता है। रामविलास पासवान ने भी लंबे समय तक केंद्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। पत्र में मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया है कि तीनों नेताओं के योगदान को ध्यान में रखते हुए उनकी प्रतिमाएं स्थापित करने और जयंती या पुण्यतिथि को राजकीय समारोह का दर्जा देने की दिशा में उचित निर्णय लिया जाए। अब इस मांग पर राज्य सरकार की ओर से क्या कदम उठाया जाता है, इस पर राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र की नजर बनी हुई है।

BPSC की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, अभ्यर्थियों की बढ़ती नाराजगी के बीच जवाबदेही की मांग

पटना। बिहार लोक सेवा आयोग यानी BPSC की कार्यप्रणाली को लेकर अभ्यर्थियों के बीच नाराजगी लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों का कहना है कि परीक्षा से जुड़े मामलों में बार-बार सामने आने वाली त्रुटियां उनके लिए गंभीर परेशानी का कारण बन रही हैं। छात्रों का आरोप है कि किसी परीक्षा प्रक्रिया में गलती सामने आने के बाद स्पष्टीकरण या संशोधन तो जारी कर दिया जाता है, लेकिन उस गलती से प्रभावित होने वाले अभ्यर्थियों की परेशानी का समाधान आसानी से नहीं हो पाता। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों छात्र कई वर्षों तक मेहनत करते हैं। सीमित उम्र सीमा, आर्थिक दबाव और लगातार बढ़ती प्रतियोगिता के बीच वे एक परीक्षा को अपने भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। ऐसे में परीक्षा की तारीख, प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी, परिणाम अथवा अन्य प्रक्रिया से जुड़ा कोई भी बदलाव अभ्यर्थियों के लिए चिंता बढ़ा सकता है। हाल के घटनाक्रमों को लेकर सोशल मीडिया पर भी BPSC की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कुछ लोगों ने व्यंग्यात्मक अंदाज में आयोग के नाम का नया अर्थ तक गढ़ दिया है। सोशल मीडिया पर BPSC को लेकर किए जा रहे ऐसे पोस्ट इस बात का संकेत हैं कि परीक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों के बीच असंतोष किस स्तर तक पहुंच रहा है। बार-बार संशोधन से बढ़ती परेशानी अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी शिकायत परीक्षा प्रक्रिया में बार-बार होने वाले बदलावों को लेकर है। उनका कहना है कि परीक्षा की तैयारी पहले से तय नियमों और दिशा-निर्देशों के आधार पर की जाती है। यदि बाद में किसी नियम, उत्तर या प्रक्रिया में बदलाव होता है तो उसका सीधा असर तैयारी कर रहे छात्रों पर पड़ता है। छात्रों का तर्क है कि एक प्रतियोगी परीक्षा केवल प्रश्नपत्र हल करने तक सीमित नहीं होती। इसके पीछे महीनों और कई बार वर्षों की तैयारी होती है। अभ्यर्थी कोचिंग, किताबों, टेस्ट सीरीज और अध्ययन सामग्री पर पैसा खर्च करते हैं। कई छात्र नौकरी या अन्य विकल्प छोड़कर पूरी तरह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुट जाते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया से संबंधित किसी भी अनिश्चितता का प्रभाव केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि छात्र के करियर और पारिवारिक परिस्थितियों तक पहुंच जाता है। एक गलती का असर कितने छात्रों पर पड़ता है? किसी परीक्षा में यदि एक छोटी तकनीकी या प्रक्रियागत गलती होती है तो उसका प्रभाव हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है। परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र प्रत्येक अंक को महत्वपूर्ण मानता है। एक अंक से मेरिट में बड़ा अंतर आ सकता है और चयन या असफलता का फैसला बदल सकता है। इसी कारण अभ्यर्थी चाहते हैं कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की ओर से प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी, परिणाम और अन्य प्रक्रियाओं की जांच बेहद सावधानी से की जाए। छात्रों का कहना है कि यदि किसी गलती के बाद संशोधन किया जाता है तो आयोग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उससे कितने अभ्यर्थी प्रभावित हुए और उनके हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। स्पष्टीकरण से आगे समाधान की मांग BPSC से जुड़े विवादों में एक अहम सवाल यह भी है कि सिर्फ स्पष्टीकरण जारी करने से क्या छात्रों की समस्या खत्म हो जाती है? अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि किसी प्रक्रिया में त्रुटि सामने आती है तो पारदर्शी तरीके से उसका समाधान जरूरी है। छात्र चाहते हैं कि आयोग अपनी प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट बनाए और किसी भी संशोधन की जानकारी समय पर आधिकारिक माध्यम से उपलब्ध कराए। इससे अफवाहों और सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत सूचनाओं को भी रोका जा सकता है। अभ्यर्थियों की मांग है कि परीक्षा से जुड़े हर महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी एक ही आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो। इससे छात्रों को अलग-अलग सोशल मीडिया पोस्ट या अनधिकृत सूचनाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। उम्र सीमा और भविष्य का सवाल प्रतियोगी परीक्षाओं में उम्र सीमा एक महत्वपूर्ण मुद्दा होती है। कई अभ्यर्थी वर्षों तक एक ही परीक्षा की तैयारी करते हैं। यदि किसी कारण से परीक्षा प्रक्रिया लंबी होती है या परिणाम में देरी होती है तो उम्र सीमा पार होने का खतरा भी रहता है। यही वजह है कि छात्र परीक्षा कैलेंडर और समयबद्ध प्रक्रिया की मांग करते हैं। उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया जितनी अधिक पारदर्शी और समयबद्ध होगी, अभ्यर्थियों को उतनी ही कम अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा। एक छात्र के लिए परीक्षा सिर्फ एक तारीख नहीं होती। इसके साथ उसकी नौकरी की उम्मीद, परिवार की आर्थिक स्थिति और भविष्य की योजनाएं जुड़ी होती हैं। छात्रों के धैर्य की भी एक सीमा होती है BPSC को लेकर सोशल मीडिया पर उठ रही नाराजगी का एक बड़ा कारण यही है कि छात्रों को लगता है कि उनकी समस्याओं को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई पोस्टों में आयोग की कार्यप्रणाली पर व्यंग्य किया जा रहा है। हालांकि किसी भी संस्था की आलोचना तथ्यों और जिम्मेदार भाषा के साथ होना जरूरी है। वहीं दूसरी ओर परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की भी जिम्मेदारी है कि वह अभ्यर्थियों की शिकायतों को गंभीरता से सुने और जहां वास्तविक समस्या हो, वहां समय पर समाधान उपलब्ध कराए। पारदर्शिता से कम हो सकता है विवाद विशेषज्ञों और प्रतियोगी परीक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि किसी भी भर्ती परीक्षा की विश्वसनीयता के लिए तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं—पारदर्शिता, समयबद्धता और जवाबदेही। यदि किसी परीक्षा में गलती होती है तो उसे स्वीकार कर सुधारना सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए व्यवस्था में सुधार किया जाए। अभ्यर्थियों का भरोसा केवल परीक्षा परिणाम से नहीं बनता। परीक्षा की पूरी प्रक्रिया के दौरान आयोग की ओर से दी जाने वाली जानकारी, समय पर जारी होने वाली सूचनाएं और शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। सोशल मीडिया बना छात्रों की आवाज आज प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े अभ्यर्थी अपनी समस्याओं को सोशल मीडिया के जरिए बड़े स्तर पर सामने रखते हैं। किसी परीक्षा से जुड़ी छोटी समस्या भी कुछ ही समय में हजारों छात्रों तक पहुंच