नई दिल्ली: पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़े वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ में भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर भारत की भूमिका और भविष्य की चुनौतियों पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच दुनिया को अपने विकास मॉडल और सोच में भी आवश्यक बदलाव लाना होगा।
आर. वेंकटरमणी ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्ष 2024 में संयुक्त राष्ट्र के ‘समिट ऑफ द फ्यूचर’ में दिए विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर जो लक्ष्य निर्धारित किए जा रहे हैं, उनके अनुरूप सामूहिक कार्रवाई भी होनी चाहिए। पर्यावरणीय चुनौतियां किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं, इसलिए इनके समाधान के लिए दुनिया के देशों और समाजों को मिलकर काम करना जरूरी है।
उन्होंने समुद्र, ग्लेशियर, जंगल, जलस्रोत और वायु गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह सोचने की जरूरत है कि महासागरों को सुरक्षित कैसे रखा जाए, ग्लेशियरों को संरक्षित कैसे किया जाए, जंगलों की स्थिति बेहतर कैसे बनी रहे, जलस्रोतों को लगातार पुनर्भरित कैसे किया जाए और हवा को स्वच्छ कैसे रखा जाए।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी लगातार बदलने वाली व्यवस्थाएं हैं। ऐसे में इनके सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने के तरीके भी समय के साथ विकसित होने चाहिए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल नियमों और कानूनों का विषय मानने के बजाय जीवन और सभ्यता से जुड़े व्यापक दृष्टिकोण के रूप में देखने की जरूरत बताई।
उन्होंने एक ऐसे नए सभ्यतागत ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें विवेक, संवेदनशीलता, ज्ञान और दूरदर्शिता के आधार पर विकास और जीवनशैली को आगे बढ़ाया जाए।
नेपाल में हाल की आपदाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं पहाड़ों और ग्लेशियरों की संवेदनशीलता की गंभीर याद दिलाती हैं। प्रकृति की अपनी सीमाएं हैं और मानव गतिविधियों को उसके अनुरूप संतुलित करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारत ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं, लेकिन इस संतुलन को लगातार बनाए रखना भविष्य में भी एक बड़ी चुनौती रहेगा।