ममता बनर्जी की बनाई TMC में अब पहचान को लेकर बगावत, 28 साल बाद बदले हालात

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पहचान लंबे समय से ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर से जुड़ी रही है। कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। अपने राजनीतिक संघर्ष और आंदोलनों के जरिए उन्होंने पार्टी को राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल किया। हालांकि, करीब 28 साल बाद पार्टी के भीतर ही विरोध और बगावत का दौर उसकी पहचान से जुड़े सवाल तक पहुंच गया है।

इस पूरे घटनाक्रम का ताजा केंद्र चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला है। आयोग ने 6 अक्टूबर को होने वाले पश्चिम बंगाल उपचुनाव के लिए फिलहाल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगाई है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब पार्टी की राजनीतिक विरासत और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर मतभेद सामने आए हैं।

इस निर्णय ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक असामान्य स्थिति पैदा कर दी है। पहली बार ऐसा परिदृश्य सामने आया है, जिसमें ममता बनर्जी का गुट और पार्टी से अलग हुए या विरोध में खड़े नेता, दोनों ही आगामी चुनाव में उस नाम और चुनाव चिन्ह के बिना मैदान में उतरने की स्थिति में हैं, जिसके साथ तृणमूल कांग्रेस ने लगभग तीन दशकों तक चुनाव लड़ा है।

ममता बनर्जी के राजनीतिक इतिहास में बगावत कोई नई बात नहीं रही है। कांग्रेस से अलग होने का उनका फैसला ही आगे चलकर TMC के गठन का आधार बना था। इसके बाद उन्होंने कई राजनीतिक चुनौतियों और पार्टी के भीतर उठे असंतोष का सामना करते हुए संगठन पर अपनी पकड़ बनाए रखी।

अब परिस्थितियां कुछ अलग नजर आ रही हैं। जिस राजनीतिक संघर्ष और विद्रोह की राह से ममता ने अपनी पार्टी की नींव रखी थी, उसी पार्टी के भीतर विरोध की आवाजें उसकी पहचान और चुनावी विरासत को लेकर चुनौती बनकर सामने आई हैं।

चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला आगे किस दिशा में जाता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल यह विवाद केवल नाम और चुनाव चिन्ह तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक पहचान और राजनीतिक विरासत को लेकर चल रही खींचतान भी सामने आ गई है।

Latest